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Birthday Special : जानिए ‘राष्ट्र कवि’ मैथिलीशरण गुप्त के जीवन के कुछ अनछुए पहलु…

नई दिल्ली:  यहाँ काव्य या साहित्य परिभाषित करने का इतना ही अर्थ है कि कुछ ऐसे महान् कवि होते हैं, जिनकी कृति में काव्य की सारी परिभाषाएँ समाहित हो जाती हैं. मैथिली शरण गुप्त जी भी ऐसे ही सशक्त कवि हैं, जिनकी कविता सरलता को ओढ़े हुए, सहजता को सँजोये हुए, काव्य की परिभाषा को भी मुखरित करती हैं. देश के कई कवियों को ‘राष्ट्र कवि’ की उपाधि से सम्बोधित किया गया है.

मगर मैथिली शरण गुप्त जी ही एक ऐसे कवि हैं, जिन्हें स्वयं महात्मा गाँधी ने ‘राष्ट्र कवि’ की उपाधि दी थी. महादेवी वर्मा उन्हें हिन्दी-कविता, का जन्मदाता कहती थी. उनके समय में हिन्दी-साहित्य में तीन ‘द’ को बड़े आदर की दृष्टि से देखा जाता था- दादा माखनलाल चतुर्वेदी, दद्दा मैथिली शरण गुप्त और दीदी महादेवी वर्मा. सबके नाम में भी ‘म’ का सादृश्य था.

आपका जन्म मध्य प्रदेश के चिरगाँव (झाँसी) में पिता रामचरण जी और माता काशी देवी के यहाँ 3 अगस्त 1886 को हुआ. आप अपने माता-पिता की तीसरी सन्तान थे. पिता रामचरण जी का अच्छा व्यापार था. मगर अपने ही मुनीम से धोखा खाकर उन्होंने व्यापार को समेट लिया. व्यापार में भारी घाटा होने के बावजूद भी वे हतोत्साहित नहीं हुए. वे एक सम्मानित व्यक्ति थे और स्थानीय जिला बोर्ड के सदस्य थे. महाराजा ओरछा उन्हें बहुत सम्मान देते थे. व्यापार के घाटे से त्राण पाने के लिए श्री रामचरण जी भक्ति-भाव की कविताएँ लिखने लगे.

मैथिली शरण गुप्त के दो काव्य ‘रहस्य रामायण’ और ‘सीता राम दम्पती’ काफी चर्चित थे. शायद पिता के द्वारा दिया गया यह काव्य-संस्कार मैथिली शरण गुप्त जी पर छाया बनकर उतर गया. माता काशी देवी भी गोस्वामी तुलसीदास का ‘रामचरित मानस’ नित्य पढ़ती थी और उनका भी संस्कार मैथिली शरण गुप्त जी पर बचपन से ही पड़ा. इन्हीं सुसंस्कारों के कारण मैथिली शरण गुप्त जी एक बड़े और अच्छे कवि बनने के साथ ही उससे भी बड़े और अच्छे एक इन्सान के रूप में ख्याति अर्जित किए.

मैथिली शरण गुप्त के बड़प्पन की चर्चा करते हुए एक बार महादेवी वर्मा ने कहा था-

‘‘अब तो भगवान् के यहाँ वैसे साँचे ही टूट गए जिनसे दद्दा जैसे लोग गढ़े जाते थे.’’

यह भी एक सामाजिक विडम्बना ही थी कि ऐसे होनहार बालक की शादी सन् 1895 में मात्र 9 वर्ष की अवस्था में कर दी गई. पाँच वर्ष बाद गौना हुआ और अभी तीन वर्ष भी पत्नी के साथ जीवन का संगीत नहीं सुन पाये थे कि वह इस लोक से ही सन् 1903 में विदा हो गई. उस समय उनकी अवस्था मात्र 17 वर्ष की थी. कहा जाता है कि दुर्दिन भी मिलकर एक साथ आते हैं.

‘भारत भारती’ ने उन्हें सफलता के श्रेष्ठ सोपान पर प्रतिष्ठित कर दिया और वे ‘राष्ट्रकवि‘ कहलाने लगे. ‘भारत भारती’ में भारत का गौरव बोल रहा है, भारत की संस्कृति विहँस रही है और भारत का इतिहास राष्ट्रीयता का गान कर रहा है. ‘भारत भारती’ में समाज में व्याप्त कुरीतियों पर भी करारा प्रहार है, धर्म के नाम पर चलने वाले मिथ्याचार और अनाचार पर भी गहरी चोट की गई है और सबसे बढ़कर राष्ट्रीयता की भावना का प्रबल संचार इस पुस्तक में उफान पर है. गुप्त जी की रचनाओं का मूल उत्स राष्ट्र, राष्ट्र-प्रेम, राष्ट्रीय-एकता, राष्ट्र-रक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय महापुरुष रहे हैं जो उनकी कविताओं में प्राण का पांचजन्य फूँकते हैं.

‘‘हे नवयुवाओ ! देश भर की दृष्टि तुम पर ही लगी,

है मनुज जीवन की तुम्हीं में ज्योति सबसे जगमगी

दोगे न तुम तो कौन देगा योग देशोद्धार में ?

देखो, कहाँ क्या हो रहा है आजकल संसार में’’

 

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