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दुमका: मूलभूत सुविधाओं को तरस रहा ये गांव, ना शौचालय ना ही राशन कार्ड

dumka vilaage lacking basic facilities दुमका: झारखण्ड के दुमका जिले के प्रखंड जरमुंडी के पंचायत चोरखैदा गांव बसमता पहाड़िया टोला के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है. ये गांव एक समय में तसर कारीगरी के लिए प्रसिद्ध था. आज यहां के लोग वृध्दा पेंशन, प्रधानमंत्री आवास, राशन कार्ड, स्वच्छ पेयजल, शौचालय आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं.

इस गांव में लगभग 26 घर हैं. इस गांव में 2001 में एक रेलिंग भवन (सूत काटने )के लिए उस समय के वर्तमान दुमका उपायुक्त निधि खरे के द्वारा लगभग 400000 रुपैया में डिपार्टमेंटल इंजीनियर से बनवाया गया था. खुद डीसी साहब के देखरेख में इस भवन में उस समय तसर सूत काटने के लिए 7 मशीन भी लगाई गई. गांव में बिजली नहीं रहने के कारण पैरों के द्वारा चलाने वाली मशीन दी गई थी. इस मशीन से तसर धागा काटने का काम किया जाता था. इस धागा को तैयार करने के लिए कोकून तसर गोपीकांदर काठीकुंड से थोक व्यापारी लेकर इस गांव में पहुंचते थे, जहां मोल भाव करके इस में कार्यरत महिलाओं को कच्चा माल दे दिया जाता था. जिसके बाद इन महिलाओं के द्वारा तसर सूत तैयार किया जाता था. हर सप्ताह भागलपुर से माल लेने के लिए इस गांव में वहां के दुकानदार आते थे और हर महिला को सौ ग्राम सूत पर ₹200 देते थे. कहने का मतलब यह हुआ, एक महिला हर दिन 200 ग्राम सूट काटती थी और इस के एवज में ₹400 रोज के हिसाब से इस में कार्यरत महिलाओं को दी जाती थी.



इन महिलाओं को दुमका के सुधीर सिंह के द्वारा 3 महीने की ट्रेनिंग दी गई थी. ट्रेनिंग के दरमियान 14 महिलाओं ने ट्रेनिंग ली थी, जो इसी गांव की थी. उसके बाद इन महिलाओं के द्वारा 14 अन्य गांव के महिलाओं को भी ट्रेनिंग दी गई. कहने का मतलब यह हुआ 28 पहाड़िया महिला इस रेलिंग भवन में कार्यरत थी, जो सिंहनी, कटेली, सालजोर, परसबनी, जारा कुरबा, विराजपूर आदि गांव से यहां काम करने आती थी.

2001 में इस गांव में झारखंड के प्रथम राज्यपाल प्रभात कुमार के द्वारा इस रेलिंग भवन का उद्घाटन किया गया था जो लगभग 5 साल चला. लेकिन 2008 से ना तो कोई माल लेकर यहां आया और ना ही कोई यहां से सूत खरीदने ही आया. धीरे-धीरे मशीनें भी खराब होने लगी. अब यह भवन भूत बंगला के रूप में गांव के महिलाओं के सामने मौजूद है. एक तरफ सरकार के द्वारा कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं महिलाओं को स्वरोजगार के लिए, दूसरी तरफ जहां महिला कमा रही थी काम कर रही थी उसे बंद कर दिया गया. बंद होने का क्या कारण है वह यहाँ के ग्रामीण नहीं बता पा रहे हैं.

ग्रामीण महिलाएं बताती है कि जब भी कोई चुनाव सामने आता है, मुखिया विधायक सांसद वोट मांगने आ जाते हैं. उनकी दुर्दशा देखकर आश्वासन भी देते हैं लेकिन महिलाओं को मिलने वाला रोजगार अब तक चालू नहीं कराया जा सका है. गांव की वार्ड नंबर 10 की पार्षद मीना देवी ने भी इस बात को कबूल किया कि कई बार पेंशन के लिए हम लोगों ने कागज दिया लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. गांव की समस्याओं के बारे में भी कई बार मुद्दा उठाया उस पर भी कोई सुनवाई अब तक नहीं हुई है.



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