लाइलाज एवं असाध्य रोग नहीं है अर्थराइटिस : डॉ देवनीस खेस्स

पवन ठाकुर

हमारे देश में हड्डियों एवं जोड़ों के दर्द की समस्या खासकर अर्थराइटिस आज आम होती जा रही है. उम्रदराज लोगों के अलावा शहरी युवाओं को भी यह बीमारी तेजी से अपने चंगुल में ले रही है. बढ़ती उम्र के अलावा कुछ और फैक्टर भी इस बीमारी के बढ़ने में रोल निभाते हैं. अगर इन फैक्टर्स को ध्यान में रखकर पहले ही सचेत हो जाएं तो इसका असर काफी कम किया जा सकता है. भारत में तकरीबन एक करोड़ बीस लाख लोग रयूमेटाइड अर्थराइटिस से पीड़ित हैं. जबकि आस्टियोअर्थराइटिस से पीड़ित मरीज लगभग हर घर में पाये जाते हैं. प्रत्येक वर्ष इन बिमारियों का प्रतिशत बढ़ रहा है. अर्थराइटिस क्या है, इसके लक्षण क्या हैं, क्या उपचार है, इनपर विस्तार से रोशनी डाल रहे हैं रांची के मेदांता अस्पताल के रयूमेटॉलॉजिस्ट (अर्थराइटिस विशेषज्ञ) डॉक्टर देवनीस खेस्स.

क्या है अर्थराइटिस

डॉक्टर खेस्स बताते हैं कि अर्थराइटिस का अर्थ है जोड़ों में (दर्द, सूजन, अकड़न) विकृति. अज्ञानतावश लोग इसे लाइलाज एवं असाध्य रोग मानते हैं. यह बिमारी अक्सर बुजुर्गों में देखने को मिलती है. जो अक्सर दर्द के मारे असहाय होकर या तो बिस्तर पर कैद हो जाते हैं या फिर असमर्थता के कारण घर से निकल नहीं पाते, या फिर बैशाखी, छड़ी, वॉकर इत्यादि की सहायता लेकर चलते हैं. गांव-देहात में लोग इसे ‘बाण मारना’ या डायन की करतूत समझने लगते हैं. अर्थराइटिस दूध पीते बच्चे से लेकर 90 साल के बुजुर्गों को भी हो सकता है. अर्थराइटिस की शिकायत शहरी जनसंख्या में सुदूर ग्रामीण इलाके की अपेक्षा अधिक होता है. इसका कारण जीवनशैली में भारी बदलाव, कसरत और श्रम की कमी, खाद्य पदार्थ में रसायन की मात्रा, प्रदूषण, अत्यधिक इलेक्ट्रॉनिक गैजेटों का इस्तेमाल इत्यादि है, लेकिन औद्योगिक रूप से ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले भी इसकी चपेट में हैं.

अर्थराइटिस के क्या हैं लक्षण

अर्थराइटिस अन्य बिमारियों से थोड़ा अलग है. इनमें आराम करने या सो कर उठने के बाद सबसे अधिक दिक्कत महसूस होती है. मांसपेशियों में दर्द, थकान एवं अकड़न होती है. लोगों की रातें करवट बदलते हुए बीत जाती है. धीरे-धीरे व्यक्ति को बिस्तर से उठने का मन नहीं करता है पर जैसे-जैसे लोग चलना-फिरना शुरु करते हैं वैसे-वैसे उनका दर्द और अकड़न कम होते जाता है. अगर अर्थराइटिस नियंत्रित न हो तो ठंड, आद्र मौसम और बादल छाने पर जोड़ों में अधिक दर्द होने लगता है.

अर्थराइटिस के प्रकार

अर्थराइटिस को आम बोल-चाल की भाषा में गठिया, वात् वाय कहते है. यह अनेक प्रकार के होते हैं. उम्रदराज लोगों में एवं जोड़ो का अत्यधिक इस्तेमाल होने वाले व्यवसाय जैसे ठठेरा, कम्प्यूटर पर काम करने वाले, चार-छह घंटे लगातार कोचिंग पढ़ाने वाले शिक्षकों में डिजेनेरेटिव अर्थराईटिस होता है जिसे आस्टियोअर्थराइटिस कहते हैं. बच्चों के भारी स्कूल बैग, मोटापा, बैठने के गलत तौर-तरीके भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. वंशानुगत रूप से प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) की गड़बड़ी से जोड़ों और उसके आसपास के अंगों में अत्यधिक सूजन से जोड़ों के बीच में स्थित मांस (जिसे कार्टिलेज कहते हैं) नष्ट होने लगता है. उसके अंदर ढ़के हुए हड्डी में अपरदन होने से जोड़ों में अत्यधिक सूजन, दर्द, अकड़न और विकृति होती है. यह सबसे खतरनाक अर्थराइटिस है, क्योंकि इम्यून सिस्टम की ओवर एक्टिविटि से शरीर के सारे अंग प्रभावित हो सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से रयूमेटॉलॉजिस्ट स्पोंडिलाइटिस एवं एकाईलोजिंग’ अर्थराइटिस आते हैं. इस प्रकार के अर्थराइटिस से आंखों पर प्रभाव होता है। आंखों के आंसू सूखने लगते हैं और रोशनी भी जा सकती है. फेफड़े में असर से सूखी खांसी और दम भी फूलता है, जिसे रयूमेटाईड लंग’ भी कहते हैं. रयूमेटाईड अर्थराइटिस में दिमाग और हृदय की धमनियों में सूजन आने से लकवा एवं हार्ट अटैक हो सकता है. रयूमेटाईड अर्थराइटिस बच्चों में सोलह साल के उम्र तक होता है. यह बिमारी महिलाओं और युवतियों में पुरुषों के अपेक्षा पांच गुणा अधिक पायी जाती है. यह दो उम्र में अधिक प्रभावी होती है. पहला 35-40 वर्ष और दूसरा 60-65 वर्ष की उम्र में. पुरुषों में 70-75 वर्ष की उम्र में अधिक रफ्तार से होता है.




एकाईलॉजिंग पुरुष प्रधान अर्थराइटिस है. इसमें महिलाओं की अपेक्षा पुरुष दस गुणा ज्यादा प्रभावित होते हैं. 15 से 45 वर्ष की उम्र के पुरुषों पर यह बीमारी ज्यादा असर करती है. रयूमेटाईड अक्सर हाथों और पैरों के छोटे-छोटे जोड़ों में समानांतर रूप से प्रभावित करता है जबकि एकाईलॉजिंग स्पोंडिलाइटिस कमर और कुल्हे को जकड़ लेता है और पीड़ित व्यक्ति के कमर एवं गर्दन की लचक खत्म हो जाती है. साथ ही रोगी आगे की ओर झुकने लगता है मतलब कुबड़ा होने लगता है.

तीसरे प्रकार का अर्थराइटिस युरिक एसिड की अधिकता से होता है जिसे ‘गाउट’ कहा जाता है. अक्सर लोग इसे भी गठिया ही कहते हैं, क्योंकि इसमें जोड़ों के आसपास गांठ बन जाता है. डायबिटिज, थायरॉईड के मरीजों में अक्सर कंधा जाम हो जाता है और इसे डायबिटिक एवं थायरॉईड अर्थराइटिस कहते हैं. चौथा प्रकार का अर्थराइटिस वायरस के संक्रमण से होता है, जिसे चिकनगुणिया अर्थराइटिस कहते हैं. गले के संक्रमण, मूत्र प्रणाली में संक्रमण एवं पेट के संक्रमण से भी रिएक्टिव अर्थराइटिस होता है.

उपचार

डॉक्टर खेस कहते हैं कि रयूमेटाईड अर्थराइटिस का इलाज लंबा चलता है। इलाज के लिए पहले इन बिमारियों को समझना जरूरी है, क्योंकि रयूमेटाईड अर्थराइटिस और एकाईलॉजिंग स्पोंडिलाइटिस इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी से शरीर में खुद ब खुद पैदा होता है, जिसे आसानी से नहीं भगाया जा सकता है. इसका इलाज डायरेक्ट न होकर इनडायरेक्ट है इसलिए इसका इलाज लंबा चलता है. रिसर्च में पाया गया है कि इन अर्थराइटिस को अगर इसके विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा बिमारी की शुरुआती लक्षणों से छह महीनों से दो साल के अंदर ‘डिजीज मोडीफाइंग एंटीरयूमेटिक ड्रग्स’ से इलाज किया जाय तो यह ठीक हो सकता है. दर्द और सूजन निवारक दवाईयां एवं स्टेरॉईड शुरुआती समय के लिए लाभकारी हैं, जब तक कि डीएमएआरडी दवाईयां अपना असर नहीं दिखाती हैं. इन बिमारियों में कैल्शियम और विटामिन की कमी होती है, इसलिए साथ में यह काफी लाभदायक है. लोग अक्सर अपना दर्द का इलाज कराने आते हैं. सही तरीके से इलाज कराकर एवं बिमारी को पूरी तरह से कंट्रोल में रखकर दर्द से छुटकारा पाया जा सकता है. अक्सर इन बिमारियों में जोड़ों में विकृति आ जाती है. इसमें अर्थराइटिस तो कंट्रोल में रहता है पर जोड़ों में दर्द भी रहता है. ऐसी हालत में फिजियोथेरेपी बहुत ही कारगर है. अर्थराइटिस से घुटनों एवं कुल्हों के जोड़ों के जुड़ जाने से विकृति आ जाती है. इसका इलाज आर्थोपेडिक रिप्लेसमेंट सर्जरी द्वारा घुटनों और कुल्हे का प्रत्यारोपण कर किया जाता है. अर्थराइटिस की दवाईयां छोड़ी नहीं जाती हैं, उन्हें जारी रखना चाहिए. डॉक्टर देवनीस खेस्स कहते हैं कि लोगों में यह भ्रांती है कि अर्थराइटिस के मरीजों को दूध, दही, हरी साग-सब्जियां, टमाटर, खट्टी चीजें, बैंगन, कोहड़ा, दाल, मांस-मछली, पालक इत्यादि से परहेज करना चाहिए। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि अर्थराईटिस के मरीजों के लिए यह सब बहुत ही फायदेमंद हैं. सिर्फ युरिक और गाउट के मरिजों को रेड मीट, बीयर, समुद्री खाना इत्यादी से परहेज करना चाहिए. लोग अपने वजन को नियंत्रण में रखकर, शुरु से ही कसरत करके, संतुलित आहार खाकर एवं इन बिमारियों के बारे में सही जानकारी रखकर इससे बचाव कर सकते हैं.





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