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झामुमो ने विधि आयोग को लिखा पत्र, एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा को असंवैधानिक और अव्‍यवहारिक बताया

शिबू सोरेनरांची : झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा को खारिज करते हुए इसे असंवैधानिक और अव्यवहारिक बताया है. झामुमो प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने विधि आयोग को एक पत्र लिखा है, जिसमें इसे एक बड़ी साजिश बताया है. झामुमो की ओर इस पत्र को 8 जुलाई को ही विधि आयोग को भेज दिया गया है, लेकिन पार्टी की ओर से इसकी जानकारी सोमवार को दी गयी. शिबू सोरेन ने बताया कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराये जाने की अवधारणा संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के मूल भावनाओं के प्रतिकूल है.

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व्‍यवस्‍था की खामियों के विरुद्ध देश के कई हिस्‍सों में पिछड़ों ने क्षेत्रीय दलों को चुना

उन्होंने कहा कि विगत दशकों में राष्ट्रीय दलों द्वारा जन आकांक्षाओं के अनुरुप परिणाम नहीं देने के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में वंचितों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों का एक बड़ा तबका व्यवस्था की खामियों के विरुद्ध अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए अपने-अपने क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों को आगे बढ़ाया है और उन्हें अपना समर्थन दिया है.

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प्रस्तावित व्यवस्था के क्रियान्वयन बड़ी बाधाएं आयेंगी




पत्र में कहा गया है कि देश में इस विषय पर चल रही रायशुमारी की प्रक्रिया पर ही झामुमो को आपत्ति है. यह संविधान संशोधन का विषय है. कानून की समीक्षा का नहीं. प्रस्तावित व्यवस्था के क्रियान्वयन में भी बड़ी बाधाएं आएगी और इसे सही तरीके से लागू करना संभव नहीं हो पाएगा. विगत तीन-चार दशकों में देश में और विभिन्न राज्यों में  गठबंधन की सरकारें बनी है और चली है और कई अवसरों पर अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिरी है. यदि यह व्यवस्था लागू होती है और सरकार गठन के दो-तीन साल की अवधि में सरकार गिरती है, तो क्या ऐसी परिस्थिति में राज्य के वैधानिक सरकारों को बर्खास्त करते हुए लोकसभा के साथ इन राज्यों में चुनाव कराये जाएंगे और यदि कुछ राज्यों में अपना कार्यकाल पूरा करने के पहले ही सरकारें गिरती है, तो क्या केंद्र सरकार को बर्खास्त करते हुए इन राज्यों के विधानसभा के साथ लोकसभा के चुनाव कराए जाएंगे.

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झामुमो के पत्र में कई तर्क दिये गये हैं

झामुमो की ओर से पत्र में यह भी कहा गया है कि इस प्रस्तावित व्यवस्था के पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे चुनाव में होने वाले खर्च में कमी आएगी, यह तर्क कितना हास्यास्पद है. पत्र में लिखा गया है कि जिस देश के राष्ट्रीय राजनीतिक दल आर्थिक दानव का रूप अख्तियार कर लिया है और जहां राष्ट्रीय दलों के साल में एक हजार करोड़ रुपये की घोषित आमदनी हो और जहां राष्ट्रीय दलों का अपना चुनावी बजट दुनिया के कई छोटे देशों के जीडीपी के बराबर हो, उस देश में खर्च के नाम पर बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा बनाये गये संविधान को कोई समाप्त करना चाहे, तो इसे सुधार कहेंगे या साजिश.

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