कचरे में किस्‍मत की तलाश ! कैसे पढ़ेगी – कैसे बढ़ेगी बेटी

गोमो

राजू प्रसाद

गोमो (धनबाद) : बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ, नारे तो बहुत सारे हैं. सरकार ने अपनी ओर से बहुत सारी स्कीमें चला रखी है कि गैर सरकारी संगठन पर करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है. मगर असलियत में सरकार की इस कोशिश को नाकाम करने में कही न कही गरीबी-मजबूरी-लाचारी के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों और जनप्रतिनिधि जिम्मेवार है. तभी तो गोमो रेलवे स्टेशन परिसर और आसपास छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां पढ़ने लिखने खेलने की उम्र में पानी की बोतलें जमा करके बेचकर अपना जीवनयापन करने की कोशिश करती है. गोमो रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर दो पर रेलवे पुल के नीचे हमने एक परिवार को पानी की खाली बोतलों को चुनकर जमा करते देखा. उनके साथ एक-दो साल का बच्चा भी था. पूछने पर बताया कि ट्रेनों के डब्बों में लोग पानी पीकर जो बोतलें फेंक देते है. इसी बोतलों को वे चुनकर जमा करके कबाड़ी वाले को 18 रुपये किलो बेच देते हैं. जिसके सहारे उनके घर की रोजी रोटी चलती है. बच्चे को दूध मिल पाता है. रोजाना वे सभी ट्रेनों से बोतलें जमा करके इसी तरह से बेचते हैं और अपनी जीविका चलाने को मजबूर हैं.

इधर गोमो रेलवे स्टेशन के दक्षिण पल्ली स्थित साइकिल स्टैण्ड में भी एक व्यक्ति और तीन लड़कियों  को बड़े बोरे में प्लास्टिक की खाली पानी की बोतलें भरते देखा. हमने उनसे बातें की उन्होंने भी बताया कि वे भी ट्रेनों में पानी की बोतलें चुनकर बेचते हैं. एक छोटी बच्ची जिसकी उम्र लगभग मुश्किल से 8-9 साल होगी, वो भी खाली बोतलों को बोरे में भर रही थी. हमारे बहुत बोलने पर वह बात करने को राजी हुई. “कहा कि वह पांचवीं क्लास में एडमिशन करवाकर पढ़ नहीं पाई, क्योंकि उसके पिता गुजर गए. मां अकेली पड़ गई, परिजनों ने घर से हमें भगा दिया. भूख से तड़पते क्या नहीं करते. मां बूढ़ी है, मैंने ट्रेनों से पानी की खाली बोतलें चुनना शुरू किया और गोमो के चमड़ा गोदाम स्थित कबाड़ी में बेचने लगी. 18 रु प्रति किलो बोतलें बिकती है. दिनभर में 10-12 किलो बोतलें जमा करके बेचती हूं, जिससे मेरी मां और मेरा भरण पोषण होता है. मुझे पढ़ने का बहुत शौक है, मगर क्या करूं मैं कैसे पढ़ू खर्च कौन उठाएगा, मां का ख्याल कौन रखेगा.




इनकी बातों को सुनकर किसी का पत्थर दिल भी पसीज जाये, मगर ये गैर सरकारी संगठन और जिम्मेवार सरकारी प्रतिनिधियों को इन सबसे कोई मतलब नहीं. कुछ गैर सरकारी संगठनों का जिम्मा है कि वे सभी तरह के गरीब लाचार बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजें, ताकि उनका भविष्य उज्ज्वल हो सके, लेकिन लगता है इन सब बातों को सिर्फ कागजों पर ही पढ़ने में जिम्मेवार अफसर रुचि दिखाते हैं.

सरकार ऐसे बच्‍चे-बच्चियों के लिए करे विशेष पहल : जगदीश चौधरी

झामुमो के केंद्रीय सदस्‍य जगदीश चौधरी इसके लिए सरकार से पहल करने की मांग की है. उनका कहना है कि रेलवे प्लेटफॉर्मों में काम करने वाले नाबालिग बच्चों, अनाथ गरीब बच्चों को पढ़ाने, उनकी देखभाल का जिम्मा सरकार की है. सरकार कई ऐसे योजनाओं का संचालन भी कर रही है, मगर योजनाओं को धरातल पर उतारने की जरूरत है.

ऐसे बच्‍चे-बच्चियों को चिन्ह्ति कर उचित पहल की जायेगी : बीडीओ

बिजय कुमार (प्रखंड विकास पदाधिकारी, तोपचांची) ने बताया कि बाल विकास विभाग तोपचांची की ओर से इस तरह की बच्चियों को चिन्हित करके उचित विभागीय निर्देशानुसार कार्रवाई करने का निर्देश प्राप्त है. हमारी टीम गोमो रेलवे स्टेशन परिसर जाकर ऐसे बच्चों को चिन्हित करके वरीय अधिकारियों के निर्देशानुसार उचित पहल  करेगी. जिससे छोटे-छोटे बच्चों-बच्चियों की जीवन को सुधारने और उन्हें पढ़ाने में उनकी मदद की जा सके. लेकिन फिलहाल प्रखंड कार्यालय तोपचांची के पास ऐसे बच्चों के पठन-पाठन के लिए सरकार द्वारा निर्देशित किसी प्रकार की कोई स्किम नहीं है.





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