रांची : “ढुकुआ” को मिली सामाजिक मान्यता, विवाह बंधन में बंधे 132 जोड़े, बच्चे बने साक्षी

  • सालों से साथ रहते आ रहे थे ये जोड़े
  • गरीबी की वजह से नहीं कर पाए थे शादी
  • शादी नहीं होने की वजह से नहीं मिल रही थी सामाजिक मान्यता
  • निमित्त फाउंडेशन ने कराई शादी
  • कई जोड़ों के बच्चे भी विवाह योग्य 
  • झारखंड की एक बड़ी कुरीति है ढुकुआ

रांची : झारखंड भले ही एक खनिज संपन्न राज्य है, लेकिन यहां के लोग आज भी गरीब हैं. उनकी गरीबी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के कई इलाकों में कई ऐसे जोड़े हैं, जो बिना विवाह बंधन में बंधे पति-पत्नी की तरह सालों से साथ रहते चले आ रहे हैं. उनमें से कई के बाल-बच्चों के भी बच्चे हो चुके हैं. लेकिन ये लोग सामाजिक तौर-तरीके से शादी के बंधन में नहीं बंध पाए. ऐसे ही 132 जोड़ियों को निमित्त फाउंडेशन ने सामाजिक रीति-रिवाज से विवाह के बंधन में बांधकर उन्हें सामाजिक मान्यता दिलाई.

यूं तो झारखंड में कई प्रकार की कुरीतियां हैं, जिसके बारे में आम तौर पर दुनिया जानती है. लेकिन ढुकुआ  एक ऐसी कुरीति है जिसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं. दरअसल, ढुकुआ उस प्रथा को कहते हैं जिस में गरीबी के अभाव में जोड़े बगैर शादी किए दंपत्ति की तरह एक साथ जीवन बिताते हैं, बच्चे पैदा करते हैं, लेकिन उन्हें सामाजिक मान्यता नहीं मिल पाती है. सोमवार को ऐसे ही 132 जोड़ियों को निमित फाउंडेशन ने विवाह के बंधन में जोड़ने का काम किया विवाह के बंधन में बंधने वाले कई जोड़ियों के बच्चे भी बड़े हो चुके हैं. एक ऐसी जोड़ी भी देखने को मिली जहां पिता-पुत्र और सास-बहू साथ-साथ विवाह के बंधन में बंधे. विवाह के बंधन में बंधने के बाद  जोड़ियां काफी खुश हैं. इससे पहले उन्हें दुख होता था जब गांव समाज के लोग उन्हें ताना मारा करते थे और उनके साथ रहने को नाजायज करार दिया करते थे.




132 जोड़ियों को नया जीवन और सामाजिक मान्यता दिलाने वाली संस्था निमित्त फाउंडेशन की सचिव निकिता सिन्हा ने बताया कि एक कार्यक्रम के दौरान खूंटी में उन्हें इस प्रथा की जानकारी मिली और इसके बाद उन्होंने लोगों के सहयोग से ऐसे जोड़ियों की शादी करानी शुरू कर दी. शादी के बंधन में बंधने वाली जोड़ियों को गृहस्थी चलाने के लिए जरूरी साजो-सामान भी दिए गए.

ढुकुआ प्रथा समाज की एक बड़ी बुराई है और यह किसी एक संस्था के द्वारा नहीं मिटाई जा सकती है. जरूरी है कि इसके लिए पूरा समाज आगे आए और ऐसे गरीब जोड़ों को विवाह के बंधन में बंधने में मदद करे, ताकि वे एक स्वस्थ और सुरक्षित सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकें.



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