अविभाजित बिहार के पहले एसटी मंत्री व बटुकेश्वर दत्त के सहयोगी रहे श्यामू चरण तुबिद का निधन

रांची : अविभाजित बिहार में जनजातीय समुदाय से पहले मंत्री, स्वतंत्रता सेनानी, बटुकेश्वर दत्त के सहयोगी रहे व हजारीबाग में भूदान आन्दोलन में बिनोबा भावे के प्रमुख सहयोगी 98 वर्षीय श्यामू चरण तुबिद का आज सुबह तीन बजे रांची के मेडिका में निधन हो गया. उनका पार्थिव शरीर चाईबासा ले जाया गया है, जहां आज अंतिम संस्कार किया जाएगा.

श्यामू चरण अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन में वो अंग्रेजों के आंखों में धुल झोंकते हुए पटना से रांची पैदल ही आ गए थे. भारत की स्वाधीनता के बाद वो अस्वस्थ होने के बावजूद हर वर्ष 15 अगस्त को झंडा फहराना नहीं भूलते थे. वो अपने पीछे पत्नी, वरिष्ठ भाजपा नेता व पूर्व गृह सचिव जेबी तुबिद, पुत्रवधू राजबाला वर्मा समेत भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं.

सीएम रघुवर दास ने तुबिद के निधन पर व्‍य‍क्‍त किया शोक

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने श्यामू चरण तुबिद के निधन पर शोक व्यक्त किया है. मुख्यमंत्री ने इस महान स्वतंत्रता सेनानी का राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि करने का निर्देश दिया है. चाईबासा में शुक्रवार को स्व. तुबिद की अंत्येष्टि होगी, जिसमें झारखंड के मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मण टुडू शामिल होंगे.




अर्जुन मुंडा ने दी श्रद्धांजलि

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने बीजेपी प्रवक्ता और राज्य के पूर्व गृह सचिव जेबी तुबिद के पिता श्यामु चरण तुबिद के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। अर्जुन मुंडा ने कहा कि स्व. तुबिद कोल्हान के शान थे. वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे. मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि है.

सरकारी नौकरी छोड़ आजादी की लड़ाई में हुए थे शामिल

वे ब्रिटिश संसद में बम फेंकने वाले बटुकेश्वर दत्त के निकट सहयोगी रहे. महात्मा गांधी के आह्वान पर विदेशी कपड़ों की होली जलायी और अंग्रेजी सरकार में टेक्सटाइल इंस्पेक्टर की अपनी सरकारी नौकरी छोड़ कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए. साल 1947 में वे चाईबासा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के पहले अध्यक्ष बने. झारखंड के पूर्व गृह सचिव और भाजपा के वरिष्ठ नेता जेबी तुबिद के पिता स्व. श्यामू चरण तुबिद का बड़ा राजनीतिक करियर रहा है. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में सक्रियता रहे. तब वे पटना कॉलेज में पढ़ते थे. ब्रिटिश सरकार को चकमा देते हुए उन्होंने पटना से रांची तक की पदयात्रा की और गांव-गांव में जाकर लोगों को स्वतंत्रता संग्राम के लिए जगाया. इसकी वजह से वह तीन महीने तक कॉलेज नहीं जा सके.





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