छात्र WhatsApp ग्रुप के जरिए चलाते हैं महादेव रोटी बैंक, भूखों को मुहैया कराते हैं खाना

WhatsApp Group students runs Mahadev Roti bank provides food hungryदेवघर: कहते हैं प्यासे को कुएं के पास जाना पड़ता है, कुआं प्यासे के पास कभी नहीं आता. ठीक वैसे ही भूखे को रोटी के पास जाना पड़ता है, रोटी चलकर भूख के पास नहीं आती. लेकिन यहां भूख भी है गरीबी भी है और रोटी चल कर भी आती है. एक नहीं, दो नहीं बल्कि 2 दर्जन से भी ज्यादा परिवार जिनके पास में ना छत है ना खाने का जुगाड़ और ऐसे में युवाओं का एक रूप इन्हें निश्चित समय पर खाना मुहैया कराता है. यह किसी संगठन के जरिए नहीं बल्कि व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए होता है.

यह सभी छात्र हैं और अभी इन्हें अपना भविष्य बनाना है, लेकिन इनकी गरीबी और बेबसी ने इन्हें इस काम की ओर आकर्षित कर लिया. फिर क्या था दो-तीन लोगों से शुरू हुआ यह कारवां आज 24 से 25 लोगों तक पहुंच चुका है. महादेव रोटी बैंक भगवान शंकर के नाम से एक व्हाट्सएप ग्रुप तैयार कर लिया गया और फिर क्या था सभी अपने-अपने घर से रोटी, दाल सब्जी चावल जो मिलता उसे लेकर जसीडीह स्टेशन पर चले आते और सभी को खाना खिलाते. यह सफर महीनों से चल रहा है. इसकी शुरुआत कैसे हुई और क्यों, यह कहना तो मुश्किल है.

पहले परिजन करते थे विरोध, अब करते हैं मदद

लेकिन एक रोटी की कीमत सिर्फ और सिर्फ एक भूखा व्यक्ति ही समझ सकता है. आज इस रोटी की कीमत इन युवाओं ने भी समझी है. जसीडीह स्टेशन पर लाखों श्रद्धालु आते हैं और अपने गंतव्य की ओर चले जाते हैं. लेकिन यहां 2 दर्जन से अधिक ऐसे परिवार हैं जो दिन भर या तो मेहनत मजदूरी के लिए भटकते रहते हैं या कोई ठिकाना नहीं रहने के कारण भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं और रात में स्टेशन पर ही अपने बाल-बच्चों के साथ सो जाते हैं.

किसी दिन कुछ आमदनी हुई तो खाना मिलता है, नहीं तो भूखे ही रहते हैं. रहने को घर नहीं सोने को बिस्तर नहीं लेकिन भूख कहां मानने वाली, जसीडीह के रहने वाले कुछ छात्र हैं उनकी नजर इनकी दुर्दशा पर पड़ी और फिर क्या था अपने दोस्तों के साथ मिलकर इन्होंने एक WhatsApp ग्रुप बना लिया और भोले की नगरी में भोले के नाम पर बना डाला  जय महादेव रोटी बैंक. धीरे-धीरे लोग इसमें जुड़ते गए और यह कारवां महीनों से चल रहा है. छात्र अपने घर से रोटियां बनवाकर लाते हैं. शुरुआती दौर में परिजनों ने भी ऐसे कार्य को नहीं करने का आदेश अपने बच्चों को दिया और इसे गलत काम बताया.

ऐसे में कुछ छात्रों ने परिवार के द्वारा मना किए जाने के बाद होटल से रोटी खरीद कर इनको खिलाना शुरू कर दिया लेकिन समय के साथ सब कुछ ठीक हो गया अब परिजन रोटी बना कर भी देते हैं और यह गरीब अपनी भूख मिटा भी रहे हैं.




जसीडीह स्टेशन में चार प्लेटफार्म है और चारों प्लेटफार्म पर यह घूम-घूम कर ऐसे लोगों की भी तलाश करते हैं. जो श्रद्धालु हैं और उनके पास खाने के पैसे नहीं हैं यह इन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए पैसे भी देते हैं. साथ ही इन्हें खाना खिलाते हैं और रास्ते के लिए भी खाना पैक कर दे देते हैं.

कभी ब्रेड-दूध तो कभी कचोरी-सब्जी भी दी जाती है खाने में

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धीरे-धीरे कई संगठनों ने भी अपनी हिस्सेदारी निभानी शुरू कर दी और अब सभी संगठन के लोग पचास से सौ रुपए देते हैं जिससे रोजाना इन के लिए लजीज खाने की व्यवस्था की जाती है. यहां सिर्फ रोटी सब्जी नहीं बल्कि कभी चावल-दाल भी दिया जाता है. यहां तक की किसी दोस्त के जन्मदिन पर ये अपनी खुशियां भी प्लेटफार्म पर ही बैठ कर मनाते हैं. कभी इन्हें ब्रेड-दूध तो कभी कचोरी सब्जी तो कभी जन्मदिन के दिन इन्हें लजीज खाना भी दिया जाता है.

छात्र बताते हैं कि शुरू-शुरू में परेशानी हुई लेकिन अब लगातार लोग जुड़ रहे हैं और खाने और खिलाने वाले दोनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. यहां के जीआरपी, आरपीएफ का भी सहयोग मिलता है और वह भी इन्हें सहयोग करते हैं. देवघर के जसीडीह स्टेशन पर यह नजारा रोजाना देखने को मिलता है. निश्चित समय पर यहां पहुंचते हैं और इन्हें खाना खिलाते हैं इसके अलावा जिनके पास कपड़े नहीं है उन्हें कपड़ा भी दिया जाता है.

एक बूढ़ी माता जी का कहती हैं कि इनके आगे पीछे कोई नहीं है. वह स्टेशन पर वर्षों से गुजारा कर रही हैं लेकिन अब इन्हें पूरा परिवार मिल गया है. बूढ़ी माता कहती हैं कि यही मेरे नाती- पोता और मेरा परिवार है. इनका कहना है कि कभी रोटी-सब्जी तो कभी हलवा, जरूरत पड़ने पर इन्हें वस्त्र भी दिए जाते हैं. इनके मुरझाए चेहरे पर आज रौनक है क्योंकि दिन का तो पता नहीं लेकिन रात में भरपेट खाना जरूर मिल जाता है. वह भी इतना की रात में अच्छी नींद आ ही जाती है. यहां तक की ट्रेन की सीटियों की आवाज़ भी इनका नींद नहीं तोड़ पाती.

कहते हैं कि मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है. आज जहां लोग WhatsApp पर और YouTube पर वीडियो और चैटिंग कर अपना समय पास करते हैं. वहीं आज के युवा इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर गरीबों की सहायता के लिए एक बड़ी और सराहनीय कोशिश कर रहे हैं, जो काबिले तारीफ है. इस ग्रुप का नाम ही महादेव रोटी बैंक रख दिया गया है लेकिन यह बैंक कहीं से नहीं है. यह तो समर्पण है, यह तो श्रद्धा है, यह गरीबों के आंसू पोछने का एक तरीका है जिसे युवाओं ने समझा है और इसे ही अमल में लाया है.





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